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उत्तराखंड में चुनाव से पहले एसआईआर के नाम पर फर्जीवाड़ा कर योग्य मतदाताओं के नाम काटे जा रहे- कांग्रेस

अजीत सिन्हा की रिपोर्ट 
नई दिल्ली:कांग्रेस ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एसआईआर के नाम पर योग्य मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। पार्टी ने कहा कि गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। कांग्रेस ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग से मिलने के लिए पिछले कई दिनों से समय मांगने के बावजूद प्रतिनिधिमंडल को समय नहीं दिया गया और गुरुवार को आयोग के कार्यालय पहुंचे पार्टी नेताओं को अंदर जाने से रोक दिया गया।

गुरुवार को उत्तराखंड की प्रभारी महासचिव कुमारी सैलजा, पार्टी के मीडिया व प्रचार (संचार विभाग) के अध्यक्ष पवन खेड़ा,प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, कांग्रेस कार्यसमिति के स्थाई आमंत्रित सदस्य गुरदीप सप्पल, काजी निजामुद्दीन, प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत, करण महारा समेत कई नेता चुनाव आयोग के कार्यालय पहुंचे। पार्टी नेताओं को कार्यालय में नहीं जाने दिया गया, जिसपर वे धरने पर बैठ गए। इसके बाद चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने पार्टी नेताओं से ज्ञापन लिया। पार्टी नेताओं ने कहा कि महाराष्ट्र और बिहार की तर्ज पर उत्तराखंड में भी लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से अवैध तरीके से हटाने का षड्यंत्र चल रहा है। भाजपा सरकार के इशारे पर चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची से कांग्रेस विचारधारा समर्थित मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर रिटर्निंग ऑफिसर के सामने गुहार लगाने के बाद भी जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तब पार्टी ने आयोग का रुख किया। उन्होंने बताया कि वर्तमान विधायकों के नाम हटाने के लिए भी अज्ञात व्यक्तियों के नाम से फर्जी शिकायतें दी जा रही हैं, जबकि संबंधित व्यक्तियों ने खुद शपथ पत्र देकर शिकायत करने से इनकार किया है।पार्टी नेताओं ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने बताया कि कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल पिछले आठ दिनों से आयोग से मिलने का समय मांग रहा था, लेकिन समय नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की जनता और उसके चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए चुनाव आयोग के दरवाजे पूरी तरह बंद हो चुके हैं। पहले चुनाव आयोग में जनप्रतिनिधियों की बात सुनी जाती थी और संवाद होता था, लेकिन अब आयोग ने खुद को बंद कर लिया है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

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