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देखें वीडियो: मोदी सरकार ने सात साल से दिए हैं अनगिनत घाव… जो अब पक कर नासूर बन गए हैं- रणदीप सिंह सुरजेवाला

नई दिल्ली / अजीत सिन्हा 
Introductory Remarks of Randeep Singh Surjewala

मैं आपके बीच हूँ, लेकर भारत माँ की दर्द भरी दास्तान !

सात साल से दिए हैं अनगिनत घाव… जो अब पक कर नासूर बन गए हैं,

सात सालों से चौपट सरकार…

सात सालों से बेरोजगारी अपरंपार…

सात सालों से कमरतोड़ महंगाई की मार…

सात सालों से लगातार गरीब की जिंदगी पर वार…

सात सालों से धरतीपुत्र किसान पर सत्ता का प्रहार…

सात सालों में अर्थव्यवस्था का कर दिया बंटाधार…

और… सात सालों बाद… सीमा पर अभी भी बाकी है प्रतिकार…

इसीलिए… मोदी सरकार देश के लिए हानिकारक है।

सात सालों में हमने क्या खोया, क्या पाया?

हमने खोई……

लोकतंत्र की गरिमाएं……. संवैधानिक संस्थाएं………

शासन की मर्यादाएं…….. प्रधानमंत्री की संवेदनाएं………

और… दर्द बांटने व वचन निभाने की मान्यताएं।

हमने खोई… इंसानियत और मानवता,

हमने खोई… अपनी आत्मनिर्भरता,

हमने खोया… वैश्विक मान,

और… बेरहम शासक ने खोया… जनता का विश्वास और सम्मान,

पर आज भी वो कहते हैं… केवल मैं ही महान।

सात साल में हमने वो सब खोया, जो सबसे न्यारा था…

हमने खोए… बहुत ही प्यारे, दिल के टुकड़े, लाखों अपने…

हमने खोए… देश के युवाओं के सपने…

हमने खोया… करोड़ों रोजगारों का आगाज़…

हमने खोया… करोड़ों किसानों की दुगुनी आय का ख्वाब…

हमने खोया… गरीबी से उबर, अच्छे दिनों के सपनों का आकार…

हमने खोए… महिलाओं व अनुसूचित जातियों के अधिकार।

पर सात साल में क्या पाया……..?

सिर्फ… नफरत और बंटवारे का साया…

सिर्फ… झूठी नोटबंदी और जीएसटी की माया…

सिर्फ… फरेब और जुमलों की छाया…

और… रक्षक की ही भक्षक बनी काया…।

पर क्या…

गंगा मैया में बहती हजारों लाशें,

उन्नाव, प्रयागराज और कानपुर में मिट्टी के तले दबी सांसें,

सरयू तट पर उतारी जा रही लाल चुन्नियां,

श्मशान घाट की नई चुनी ऊँची ऊँची दीवारों के पीछे दहकती आग की चिमनियां….

क्या यह सब… मेरी भारत मां के संस्कार और संस्कृति हो सकते हैं…

नहीं, कभी नहीं……………….

क्योंकि… जब अंतिम संस्कार का अधिकार भी छीन ले सरकार…

जब महामारी में अंतिम यात्रा और रीति रिवाज़ की भी न हो दरकार…

जब ये अंतर करना मुश्किल हो जाए कि……

कोरोना महामारी की मार बुरी, या भाजपा सरकार की दुत्कार बुरी………..

तो जान लें कि 73 साल में ये दुखों का पहाड़ और अपने बच्चों की दुर्दशा का भयावह मंजर भारत मां ने पहले कभी नहीं देखा…

इसीलिए… मोदी सरकार देश के लिए हानिकारक है।

आईये, सुनिए – भारत मां की जुबानी… एक निरंकुश पूंजीपोषक की कहानी……

‘भारत मां की ज़ुबानी’ का वीडियो दिखाया गया।

Concluding Remarks

आज सात साल हो गए हैं, देश को एक नाकाम, नाकारा, और नासमझ सरकार का बोझ ढोते हुए।

देश भुगत रहा है।

देश भुगत रहा है, क्योंकि आर्थिक मंदी के काले बादल चारों ओर मंडरा रहे हैं। जीडीपी की दर माईनस 8 प्रतिशत हो गई और प्रति व्यक्ति आय में भारत अब बांग्लादेश से भी पिछड़ गया है।

देश भुगत रहा है क्योंकि 7 साल में बेरोज़गारी डबल डिजिट का आंकड़ा पार कर 11.3 प्रतिशत हो गई। पिछले एक साल में 12.20करोड़ लोगों ने अपना रोटी रोजगार खो दिया। अकेले अप्रैल, 2021 में 74 लाख लोगों का रोजगार चला गया।

देश भुगत रहा है क्योंकि महामारी, महंगाई और मोदी सरकार – तीनों ही देशवासियों के दुश्मन बने हैं। कई प्रांतों में पेट्रोल 100 रुपया लीटर पार और सरसों का तेल 20 रुपया लीटर पार कर गया है। रसाई गैस का सिलेंडर भी 800 पार पहुंच गया। खाना पकाने के तेलों की कीमतों में लगी आग और दलहन की कीमतों ने हर गृहणी के बजट को तहस नहस कर दिया।

देश भुगत रहा है क्योंकि मोदी सरकार धरतीपुत्र किसानों की अगली फसल और नस्ल दोनों छीनकर अपने चंद पूंजपति मित्रों का घर भरना चाहती है। कभी उन पर लाठी-डंडे बरसाती है और कभी राहों में कील कांटे बिछाती है। तीन काले कानूनों के माध्यम से किसान की रोजी रोटी छीन लेना चाहती है।

देश भुगत रहा है क्योंकि मोदी सरकार ने गरीबी की बजाय गरीबों पर वार किया है। 7 साल में 23 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे चले गए और 3.20 करोड़ देशवासी मध्यम वर्ग की श्रेणी से ही बाहर हो गए।

देश भुगत रहा है क्योंकि कोरोना महामारी के बीच लाखों जिंदगियां सिसक सिसक कर दम तोड़ रही हैं। श्मशान और कब्रस्तान पटे पड़े हैं, पर सरकार गायब है। न ऑक्सीजन है, न वैंटिलेटर है, न आईसीयू है, न जीनरक्षक दवा है, न वैक्सीन है और मोदी सरकार पूरी तरह से गायब है।

देश भुगत रहा है क्योंकि चीन को लाल आंख दिखाना तो दूर, मोदी सरकार आज तक चीन को डेपसांग प्लेंस और भारत के दूसरे हिस्सों से वापस खदेड़ नहीं पाई। यह 73 साल में सबसे कमजोर सरकार है।

साफ है कि देश सात सालों की मोदी सरकार निर्मित बदहाली को भुगत रहा है।

जवाब मांगने और हिसाब करने का समय आ गया है।

रणदीप सिंह सुरजेवाला, महासचिव एवं मीडिया प्रभारी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बयान:

मोदी सरकार देश के लिए हानिकारक है !

सात साल, सात अपराधिक भूल !

1. ‘अर्थव्यवस्था’ बनी ‘गर्त व्यवस्था’

(I) 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई, तो उसे विरासत में कांग्रेस कार्यकाल की औसतन 8.1 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि दर मिली। पर कोरोना महामारी से पहले ही मोदी सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन के चलते जीडीपी की दर साल 2019-20 में गिरकर 4.2 प्रतिशत रह गई। 73 साल में पहली बार देश आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। साल 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी की दर गिरकर माईनस 24.1 प्रतिशत (-24.1 प्रतिशत) हो गई। हाल में ही 2020-21 की दूसरी तिमाही में यह माईनस 7.5 प्रतिशत (-7.5 प्रतिशत) है। अनुमानों में मुताबिक साल 2020-21 में जीडीपी दर माईनस 8 प्र्रतिशत (-8 प्रतिशत) रहेगी।

(II) साल 2016-17 में देश की प्रति व्यक्ति आय दर में 10.6 प्रतिशत की वृद्धि थी, जो महामारी से पहले ही साल 2019-20 में गिरकर 6.1 प्रतिशत हो गई। साल 2020-21 में प्रति व्यक्ति आय और गिरकर 5.4 प्रतिशत रह जाने का अनुमान है।

(III) यहां तक कि प्रति व्यक्ति आय की दर में बांग्लादेश भी भारत से आगे है। साल 2020-21 में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय USD2,227 आंकी गई। इसके विपरीत भारत की प्रति व्यक्ति आयUSD1,947 ही आंकी गई।

(IV) एक और गहन चिंता की बात यह है कि आईएमएफ के मुताबिक भारत का जीडीपी – कर्ज अनुपात साल 2019 में 34 प्रतिशत से बढ़कर साल 2020 के अंत में 90 प्रतिशत हो गया। साफ है कि अपराधिक वित्तीय कुप्रबंधन और गड़बड़ी के चलते मोदी सरकार ने देश को कर्ज के अंधे कुएं में झोंक डाला है।

(V) अनियोजित लॉकडाऊन के बाद अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने के लिए 20 लाख करोड़ का तथाकथित पैकेज जुमला साबित हुआ। याद करें, श्री राहुल गांधी ने कहा था, ‘‘आप सप्लाई साईड को बूस्ट कीजिए’’। पर मोदी सरकार ने एक न सुनी। हाल में आई RBI की रिपोर्ट के आधार पर SBI Research ने खुलासा किया है कि देश में ‘बैंक क्रेडिट ग्रोथ’ पिछले 59 साल से सबसे निचले पायदान पर है।

2. बेइंतहाशा बेरोजगारी, बनी है महामारी

(I) मोदी सरकार हर वर्ष दो करोड़ रोज़गार देने का वादा कर सत्ता में आई। सात साल में 14 करोड़ रोजगार देना तो दूर, देश में पिछले 45 वर्षों में सबसे अधिक चौतरफा बेरोजगारी है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनॉमी – CMIE के ताजे आँकड़ों के मुताबिक देश में बेरोजगारी की दर डबल डिजिट का आंकड़ा पार कर 11.3 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

(II) CMIEके ताजे आंकड़ों के मुताबिक केवल कोरोना काल में ही 12.20 करोड़ लोगों ने अपना रोटी-रोजगार खो दिया। इनमें से 75 प्रतिशत से अधिक दिहाड़ीदार मजदूर, छोटे कर्मचारी और छोटे दुकानदार हैं।

(III) अकेले अप्रैल, 2021 में 74 लाख लोगों को रोजगार चला गया।

3. कमर तोड़ महंगाई की मार, चारों तरफ हाहाकार

(I) एक तरफ कोरोना महामारी और दूसरी तरफ मोदी निर्मित महंगाई, दोनों ही देशवासियों के दुश्मन बने। खााद्य पदार्थों से लेकर तेल के भाव आसमान छू रहे हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण यह है कि कई प्रांतों में पेट्रोल 100 रुपया लीटर और सरसों का तेल 200 रुपया लीटर तक पार कर गया है।

(II) जब मोदी सरकार ने मई, 2014 में सत्ता सम्हाली, तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का रेट USD108 प्रति बैरल था, देश में पेट्रोल की कीमत 71.51 रु. प्रति लीटर व डीज़ल की कीमत 55.49 रु. प्रति लीटर थी। पर मोदी सरकार ने पेट्रोल व डीज़ल पर अनाप शनाप टैक्स लगा 7 साल में जनता की जेब लूट 22 लाख करोड़ रुपया इकट्ठा किया है। पिछले सात सालों में कच्चे तेल की कीमत अमेरिकी डॉलर 20-65 के बीच रही, पर पेट्रोल की कीमत साल 2014 में 71.51 रु. प्रति लीटर से बढ़कर 93.68 रु. प्रति लीटर (मध्यप्रदेश जैसे कई प्रांतों में तो 101.89 रुपया प्रति लीटर) हो गई और डीज़ल की कीमत साल 2014 के 55.49 रुपया प्रति लीटर से बढ़कर 84.61 रु. प्रति लीटर हो गई।

(III) रसोई गैस की कीमतों में बेइंतहाशा वृद्धि हो प्रति सिलेंडर 809 रुपया पहुंच गई है।

(IV) यही नहीं, खाना पकाने के तेलों की कीमतों में लगी आग ने तो हर घर का बजट बिगाड़ दिया है। मई, 2020 से मई, 2021 के बीच, एक साल में ही खाना पकाने के तेलों में 60 से 70 प्रतिशत से अधिक बढ़ोत्तरी हुई। सरसों का तेल 115 रु. प्रति लीटर से बढ़कर 200 रुपया प्रति लीटर पार कर गया है। पाम ऑईल की कीमतें 85 रु. प्रति लीटर से बढ़ 138 रु. प्रति लीटर को छू रही हैं। सूरजमुखी के तेल की कीमत 110 रु. प्रति लीटर से बढ़कर 175 रु. प्रति लीटर को पार कर गई हैं। वनस्पति डालडा घी की कीमत 90 रु. प्रति किलो से बढ़कर 140 रु. किलो तक हो गई हैं। सोयाबीन तेल की कीमत भी 100 रु. प्रति लीटर से बढ़कर 155 रु. प्रति लीटर हो गई है।

(V) दलहन की बढ़ती कीमतों ने हर गृहणी के बजट को तहस नहस कर दिया है। मई 2020 से मई, 2021 तक केवल एक साल में चना दाल की कीमत 70 रु. किलो से बढ़ 85-90 रु. प्रति किलो हो गई, अरहर दाल की कीमत 90 रु. किलो से बढ़ 120 रु. प्रति किलो हो गई व मसूर दाल की कीमत 65 रु. किलो से बढ़ 90 रु. किलो हो गई। यही हाल अन्य खाद्यान्नों का भी है।

4. किसानों पर अहंकारी सत्ता का प्रहार

(I) आज़ाद भारत के इतिहास की पहली सरकार है जो न सिर्फ़ किसानों से उनकी आजीविका छीन कर पूँजीपति दोस्तों का घर भरना चाहती है अपितु अन्नदाता भाइयों की प्रतिष्ठा भी धूमिल कर रही है। कभी उन पर लाठी डंडे बरसाती है ,कभी उन्हें आतंकी बताती है, कभी राहों में कील और काँटे बिछाती है। 2014 में आते ही पहले अध्यादेश के माध्यम से किसानों की भूमि के ‘उचित मुआवज़ा कानून 2013’ को बदल कर किसानों की ज़मीन हड़पने की कोशिश की।

(II) मोदी जी ने सत्ता ली किसान को लागत+50 प्रतिशत मुनाफा देने का वादा कर। वादे के बावजूद 2015 में सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर लागत का 50 प्रतिशत ऊपर समर्थन मूल्य देने से साफ इंकार कर दिया।

(III) फिर 2016 में प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना के नाम पर प्रायवेट कंपनियों को लूट की खुली छूट दे दी गई। 2016 खरीफ से 2019-20 तक इस योजना में लगभग 99,073 करोड़ रु की प्रीमियम केंद्र, राज्य और किसानों ने अदा की और बीमा कंपनियों ने 26,121 करोड़ रु का मुनाफ़ा कमाया।

(IV) मोदी सरकार ने 2018 में किसान सम्मान निधि के नाम से एक और छलावा किसानों के साथ किया। देश में कुल 14 करोड़ 65 लाख किसान हैं मगर मोदी सरकार किसान सम्मान निधि से लगभग 6 करोड़ किसानों को वंचित किए हुए है।

(V) एक तरफ मोदी सरकार कह रही है कि किसानों को 6 हज़ार रुपए प्रति वर्ष सम्मान निधि देकर हम किसानों की सहायता कर रहे हैं, मगर दूसरी ओर किसानों की जेब काटकर 20,000 रुपया प्रति हेक्टेयर प्रति साल निकाल लेते हैं। मोदी सरकार ने बीते छः वर्षों में डीज़ल की कीमत मई, 2014 में 55.49 रु. से बढ़ाकर आज 84.61 रु. कर दी है। अर्थात् सात साल में डीज़ल के दामों में 28.12 रु. प्रति लीटर की अतिरिक्त वृद्धि की गई। खेती पर टैक्स लगाने वाली भी यह पहली सरकार है। खाद पर 5 प्रतिशत जीएसटी, कीटनाशक दवाईयों पर 18 प्रतिशत जीएसटी, ट्रैक्टर पर 12 प्रतिशत जीएसटी व खेती के उपकरणों पर 12 प्रतिशत से 18 प्रतिशत जीएसटी लगा किसान से खूब वसूली की गई।

(VI) मोदी जी बड़बोले भाषणों में किसानों के समर्थन मूल्य पर बड़ी मात्रा में अनाज खरीदने की बात करते हैं मगर सच इससे बिल्कुल उलट है। 2020-21 में गेहूँ का उत्पादन 109.24 मिलियन टन और चावल का उत्पादन 120.32 मिलियन टन हुआ है। मोदी सरकार ने 2019-20 में चावल समर्थन मूल्य पर 519.97 लाख मेट्रिक टन खरीदा था जिसे इस महामारी की दशा में 2020-21 में घटाकर 481.41 लाख़ टन कर दिया गया है। इसी प्रकार गेहूँ, जो 2020-21 में समर्थन मूल्य पर 389.93 लाख़ टन खरीदा गया था, उसे 2021-22 में 30 अप्रैल तक मात्र 271 लाख़ टन ही खरीदा गया है।

(VII) मोदी सरकार किसान विरोधी तीन क्रूर काले कानूनों के माध्यम से अन्नदाता किसानों की आजीविका छीनकर अपने पूँजीपति दोस्तों को देना चाहती है। आज 6 माह से किसान सड़कों पर है और सत्ता के अहंकार में चूर मोदी सरकार उनकी एक नहीं सुन रही। अब तक 500 से अधिक किसानों की शहादत हो चुकी है। सरकार ये काले कानून खत्म क्यों नहीं करती?

5. गरीब व मध्यम वर्ग पर मार

(I) विश्व बैंक की रिपोर्ट ने यह बताया कि भारत में यूपीए-कांग्रेस के 10 साल के कार्यकाल में 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ पाए। परंतु मोदी सरकार के 7 साल के बाद, PEW रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक अकेले 2020 में देश के 3.20 करोड़ लोग अब मध्यम वर्ग की श्रेणी से ही बाहर हो गए। यही नहीं, 23 करोड़ भारतीय एक बार फिर गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में शामिल हो गए। गरीबी की बजाय मोदी सरकार ने गरीबों पर वार किया है।

(II) जब पिछले एक साल से पूरी दुनिया के एक्सपर्ट मोदी सरकार को हर गरीब, नौकरीपेशा और मध्यम वर्ग के खाते में सीधा पैसा ट्रांसफर करने की राय दे रहे थे, तो मोदी सरकार ने उसे दरकिनार कर कूड़ेदान में डाल दिया। इसे देश को भयंकर बेरोजगारी व चौपट अर्थव्यवस्था की शक्ल में भुगतना पड़ा क्योंकि कंज़ंप्शन अत्यधिक मात्रा में गिर गई।

(III) अप्रैल, 2021 में ग्रामीण अंचल में मनरेगा के तहत काम मांगने वाले 100 प्रतिशत मजदूरों में से मात्र 62 प्रतिशत मजदूरों को ही कुछ समय का रोजगार मिल पाया। साल 2020-21 में मनरेगा के 14.14 करोड़ एक्टिव वर्कर्स में से मात्र 1.5 करोड़ को ही 100 दिनों का रोजगार मिल पाया। यहां तक कि सरकार ने 2020-21 के मुकाबले में मौजूदा वर्ष 2021-22 में मनरेगा के बजट में ही कटौती कर डाली।

(IV) यहां तक कि महामारी में गरीबों को उज्जवला योजना के तहत तीन गैस सिलेंडर मुफ्त दिए जाने की घोषणा भी जुमला साबित हुई। यह योजना 1 अप्रैल, 2020 को शुरू की गई और यह मुफ्त सिलेंडर योजना गुपचुप तरीके से 31 दिसंबर, 2020 को समाप्त कर दी गई। इस योजना के तहत 24.4 करोड़ सिलेंडर मुफ्त दिए जाने थे, मगर मोदी सरकार ने गरीबों को लगभग 10 करोड़ सिलेंडर दिए ही नहीं और योजना समाप्त कर दी।

(V) कोरोना महामारी की विभीषिका को देखते हुए मोदी सरकार ने 26 मार्च, 2020 को घोषणा की कि जनधन खातों की महिला खाताधारकों के खातों में अप्रैल-मई-जून यानि तीन माह तक 500 रु. प्रति महीना डाला जाएगा। वैसे तो यह योजना ऊँट के मुंह में जीरे के समान थी, और इसमें से भी 2.48 करोड़ महिलाओं के खाते में एक फूटी कौड़ी नहीं डाली गई। याद करिए, वादा तो था 15-15 लाख हर खाते में डालने का,पर 1500 रु. डालने से भी गुरेज़ कर लिया।

6. महामारी की मार, निकम्मी व नाकारा सरकार।

(I) कोरोना महामारी के कुप्रबंधन के चलते देश में लाखों लोगों ने सिसक सिसक कर दम तोड़ दिया। हालांकि मौत का सरकारी आंकड़ा 3,22,512 है, पर सच्चाई इससे कई गुना अधिक भयावह है। कोरोना महामारी ने गांव, कस्बों और शहरों में लाखों लोगों के प्रियजनों को छीन लिया। पर मोदी सरकार देश के प्रति जिम्मेवारी से पीछा छुड़ा भाग खड़ी हुई।

(II) पूरे देश में ऑक्सीजन का गंभीर संकट है। देश की संसदीय समिति ने नवंबर, 2020 में इसकी चेतावनी दी। कांग्रेस पार्टी व सारे एक्सपटर््स ने इसकी चेतावनी दी, पर मोदी सरकार जनवरी, 2021 तक 9000 टन ऑक्सीजन का निर्यात करती रही।

(III) देश के लोग रेमडिज़िविर के इंजेक्शन के लिए तिल तिल कर मरते रहे, पर मोदी सरकार ने 11 लाख से अधिक रेमडिज़िविर इंजेक्शन का निर्यात कर डाला। देशवासियों को टोसिलुजुमैब और डेक्सोना के इंजेक्शन के अभाव में भी प्राण त्यागने पड़े। जीवनरक्षक दवाईयों की खुली लूट चलती रही, और मोदी सरकार जानबूझकर तमाशबीन बनी रही।

(IV) जब दुनिया के सब देश मई, 2020 में अपने नागरिकों के लिए वैक्सीन डोज़ खरीद रहे थे, तो मोदी सरकार जनवरी, 2021 तक सोई पड़ी थी। आज भी देश के 140 करोड़ जनसंख्या के लिए मात्र 39 करोड़ वैक्सीन डोज़ का ऑर्डर दिया गया है। पिछले 132 दिन में देशवासियों को वैक्सीन लबाने की औसत 15.46 लाख प्रति दिन है, तथा अब तक वैक्सीन की 20.80 करोड़ डोज़ ही लगाई गई हैं। इस गति से 18 साल की आयु से अधिक देश के सभी व्यस्कों को वैक्सीन लगाने की प्रक्रिया 22 मई 2024 तक यानि 1091 दिन में पूरी हो पाएगी। क्या तीन साल तक देश वैक्सीन लगाने का इंतजार कर सकता है? ऐसे में कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर से देशवासी कैसे बच पाएंगे।

(V) एक देश, एक वैक्सीन और पाँच अलग अलग कीमतें निर्धारण करके मोदी सरकार खुली मुनाफाखोरी को बढ़ावा दे रही है। क्या यह राष्ट्रहित में है।

(VI) क्या मोदी सरकार बताएगी कि जब देशवासियों के लिए वैक्सीन उपलब्ध नहीं, तो 6.63 करोड़ वैक्सीन का निर्यात भारत से दूसरे देशों में क्यों किया गया? क्या इससे देशवासियों की जिंदगी खतरे में नहीं डाल दी गई?
7. राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़

(I) मोदी सरकार देश की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा करने में पूरी तरह से फेल साबित हुई है। चीन को लाल आंख दिखाना तो दूर,भाजपा सरकार चीन को लद्दाख में हमारी सीमा के अंदर किए गए अतिक्रमण से वापस नहीं धकेल पाई।

(II) चीन ने आज भी डेपसांग प्लेंस में भारतीय सीमा के अंदर LAC के पार वाई-जंक्शन तक कब्जा कर रखा है, जिससे भारत की सामरिक हवाई पट्टी, दौलतबेग ओल्डी एयर स्ट्रिप को सीधे खतरा है। पर मोदी सरकार चुप है।

(III) मोदी सरकार ने पैंगोंग त्सो लेक इलाके में कैलाश रेंजेस में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पहाड़ों की चोटियों पर भारतीय सेना के कब्जे को हटाने का एक तरफा निर्णय कर दिया और भारतीय सीमा के अंदर ही LAC के इस पार बफर ज़ोन बना दिया। यह सीधे सीधे भारत की संप्रभुता से खिलवाड़ है।

(IV) चीन के द्वारा अरुणाचल प्रदेश में हमारी सीमा के अंदर एक पूरा गांव बसा लिया गया, पर सरकार चुप है। यही नहीं, डोकलाम क्षेत्र में चीन ने गैरकानूनी तरीके से कब्जा कर चिकन नेक तक पक्की सड़कों का निर्माण कर लिया, जिससे हमें सामरिक दृष्टि से खतरा है। पर मोदी सरकार चुप है।

(V) न उग्रवाद पर नियंत्रण हुआ और न ही नक्सलवाद पर। उल्टे नक्सलवादी आए दिन हमारी सुरक्षा एजेंसियों पर घातक हमले कर रहे हैं। पर प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पास इससे निपटने के लिए कोई नीति नहीं।

साफ है कि देश सात सालों की मोदी सरकार की नाकामयाबी को भुगत रहा है।

इसीलिए, मोदी सरकार देश के लिए हानिकारक है।

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