अरविन्द उत्तम की रिपोर्ट
नोएडा के भंगेल स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की तस्वीर अब पूरी तरह बदल चुकी है। सामाजिक सहभागिता की मिसाल पेश करते हुए गौरी शिक्षा फाउंडेशन ने अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया है। 30 बेड की क्षमता वाले इस स्वास्थ्य केंद्र में रोजाना करीब एक हजार मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। फाउंडेशन के सहयोग से परिसर में रोशनी, सुरक्षा और पीने के पानी की व्यवस्था को पूरी तरह दुरुस्त कर दिया गया है।

भंगेल का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र क्षेत्र के जरूरतमंद मरीजों के लिए एक बड़ा सहारा बना हुआ है। अस्पताल के अधीक्षक डॉ. यतेंद्र सिंह ने स्वास्थ्य सुविधाओं और इस सकारात्मक पहल पर विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि 30 बेड की क्षमता वाले इस अस्पताल में 24 घंटे इमरजेंसी सेवाएं संचालित होती हैं। शुरुआत में जहां ओपीडी 300 से 400 मरीजों तक सीमित थी, वहीं अब रोजाना करीब एक हजार मरीज यहां इलाज कराने आ रहे हैं। अस्पताल में डिजिटल एक्स-रे, गायनेकोलॉजिस्ट, सामान्य ओपीडी, आयुष चिकित्सा, होम्योपैथी और ब्लड बैंक स्टोरेज यूनिट (BSU) जैसी जरूरी सुविधाएं मरीजों को एक ही छत के नीचे मिल रही हैं।

अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ संस्थागत प्रसव का रिकॉर्ड भी बेहद सराहनीय रहा है। डॉ. यतेंद्र सिंह के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में अस्पताल में मैटरनल मोर्टेलिटी रेट यानी मातृ मृत्यु दर शून्य रही है। गंभीर मामलों को समय रहते हायर सेंटर रेफर किया जाता है। वहीं, हाल ही में गौरी शिक्षा फाउंडेशन के संस्थापक मुकेश शर्मा के प्रयासों से अस्पताल की पुरानी समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला गया। अस्पताल परिसर और नव-हस्तांतरित एमसीएच विंग में आरओ और वाटर कूलर ठीक कराए गए, अंधेरे को दूर करने के लिए लाइटें लगाई गईं और पूरे परिसर को सीसीटीवी कैमरों के सुरक्षा घेरे में लिया गया है।
मुकेश शर्मा का कहना नहीं, करके दिखाना है—हमारा यह प्रयास रहता है। अस्पताल आने वाला व्यक्ति पहले से परेशान होता है; उसे पीने का साफ पानी, रोशनी और सुरक्षा जैसी बुनियादी चीजें मिलनी ही चाहिए। डीएम मेधा रूपम जी से चर्चा के बाद हमने जिम्मेदारी ली। समाज के हर सक्षम वर्ग और संस्था को आगे आकर अस्पतालों और स्कूलों की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायतें तो अक्सर सुनने को मिलती हैं, लेकिन भंगेल सीएचसी में प्रशासनिक समन्वय और सामाजिक संस्था के सहयोग ने यह साबित कर दिया है कि अगर नियत साफ हो तो बदलाव मुमकिन है।
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