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दिल्ली राजनीतिक राष्ट्रीय हाइलाइट्स

कांग्रेस ने कहा- पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मिलना संवैधानिक मूल्यों की जीत।


अजीत सिन्हा की रिपोर्ट 
नई दिल्ली: कांग्रेस ने असम पुलिस द्वारा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी की शिकायत पर दर्ज एफआईआर के मामले में पार्टी के मीडिया और पब्लिसिटी के चेयरमैन पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मिलने का स्वागत करते हुए इसे संवैधानिक मूल्यों की जीत करार दिया है।नई दिल्ली स्थित कांग्रेस कार्यालय में पत्रकार वार्ता करते हुए पार्टी के कानून, मानवाधिकार एवं आरटीआई विभाग के चेयरमैन डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जताई।सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सिंघवी ने कहा कि इस मामले में ऐसी कई धाराएं लगाई गईं जो जमानती थीं, फिर भी गिरफ्तारी पर जोर दिया गया। यह पवन खेड़ा को अपमानित और परेशान करने का प्रयास था। उन्होंने बताया कि खेड़ा के खिलाफ 11 में से 9 धाराएं जमानती थीं, जिनमें पुलिस को भी गिरफ्तारी के बजाय सीधे जमानत देने का अधिकार है। इसके बावजूद करीब 60 पुलिसवालों को उनके घर पर भेज दिया गया, जबकि समाज और राजनीति में उनकी एक पहचान है।

अदालती फैसलों का हवाला देते हुए कांग्रेस सांसद सिंघवी ने कहा कि किसी भी मानहानि के मामले में गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होना चाहिए। इसमें सवाल उठता है कि क्या गिरफ्तारी के बिना पूछताछ नहीं हो सकती है? यदि आरोपी के फरार होने, साक्ष्य से छेड़छाड़ करने या जांच में बाधा डालने की संभावना नहीं है, तो गिरफ्तारी का औचित्य नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि वकील इसे ट्रिपल टेस्ट कहते हैं। ऐसी स्थिति में, यदि ट्रिपल टेस्ट अभियुक्त के पक्ष में साबित होता है, तो गिरफ्तारी का एकमात्र मकसद अपमान और उत्पीड़न ही हो सकता है। उन्होंने कहा कि यही सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सार और भावना है। उन्होंने कहा कि गुवाहाटी हाईकोर्ट के जिस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, उसमें ऐसे प्रावधान शामिल थे जो मूल शिकायत और एफआईआर का हिस्सा नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि यह भूला नहीं जा सकता कि अग्रिम जमानत के मामले में मूल सिद्धांत यह है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक किसी को दोषी नहीं माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस मामले में कई प्रकार के प्रावधानों को डाल दिया गया, ताकि यह मानहानि से एक अलग केस बन जाए। डॉ. सिंघवी ने कहा कि जिस प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात हो रही है, उसमें सब कुछ पारदर्शी रूप से सामने रखा गया था; जो कागजात दिखाए गए थे, वे पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र में थे।डॉ. सिंघवी ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री के कई सार्वजनिक बयानों का ज़िक्र किया है, जो असंसदीय और अस्वीकार्य हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की ऐसी शब्दावली और धमकियों की किसी भी गणतंत्र और चुनाव अभियान में जगह नहीं हो सकती। ऐसे में हिमंत बिस्वा सरमा को सोचना चाहिए कि क्या एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को यह शोभा देता है? उन्होंने कहा कि असम के मुख्यमंत्री इस बारे में पुनर्विचार कर गंभीर रूप से खेद व्यक्त करें ।डॉ. सिंघवी ने यह भी बताया कि 05 अप्रैल को पवन खेड़ा की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद 07 अप्रैल को असम सरकार की मशीनरी ने पूरी ताकत के साथ एक गैर-जमानती वारंट की याचिका डाली थी। कामरूप की निचली अदालत ने इस मांग को कल्पनाशील, अनुमानित और आधारहीन बताते हुए खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा कि इसके बाद यह मामला तेलंगाना हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट तक गया; अंततः सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया।उन्होंने कहा कि जब भी नागरिक स्वतंत्रता का सवाल आता है, तो न्याय व्यवस्था ही उसकी सबसे बड़ी संरक्षक होती है और कानून सभी से ऊपर है। वहीं जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि मोदी सरकार हर दिन संविधान पर हमला करती है, लेकिन आज संवैधानिक मूल्यों और प्रावधानों की जीत हुई है। यह साबित हुआ है कि हमारे देश में न्याय की ज्योति जीवित है।

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