
अजीत सिन्हा की रिपोर्ट
नई दिल्ली:कांग्रेस ने मोदी सरकार द्वारा मनरेगा को खत्म करने की कड़ी आलोचना करते हुए 10 जनवरी से 25 फरवरी के बीच देशव्यापी ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ की घोषणा की है।पार्टी ने वीबी-ग्राम-जी कानून को वापस लेने,मनरेगा को अधिकार आधारित कानून के तौर पर बहाल करने के साथ काम के अधिकार और पंचायतों के अधिकार को बहाल करने की मांग दोहराई।कांग्रेस कार्यालय में पत्रकार वार्ता में पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने कांग्रेस के देशव्यापी आंदोलन के कार्यक्रम की जानकारी देते हुए नए कानून को गरीबी उन्मूलन की सबसे सफल और ऐतिहासिक योजना मनरेगा को खत्म करने की एक सोची-समझी साजिश बताया।

वेणुगोपाल ने कहा कि मनरेगा मांग-आधारित योजना थी, जिसने हर साल पांच-छह करोड़ ग्रामीण परिवारों को संकट के समय सुरक्षा कवच प्रदान किया। उन्होंने नए कानून पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि रोजगार अब अधिकार नहीं रहा, बल्कि यह सरकार की मर्जी पर निर्भर होगा। पहले, ग्राम सभाएं और पंचायतें स्थानीय जरूरतों के हिसाब से योजना बनाती थीं। अब निर्णय लेने की पूरी शक्ति दिल्ली के पास केंद्रित हो जाएगी, पंचायतें केवल क्लर्क बनकर रह जाएंगी। काम केवल उन्हीं पंचायतों में मिलेगा जिन्हें केंद्र सरकार अधिसूचित करेगी। कई पंचायतों को फंड नहीं मिलेगा, जिससे स्थानीय योजना बाधित होगी और 73वें संविधान संशोधन की भावना का उल्लंघन होगा। नए कानून के तहत योजना में बजट की सीमा और मानक आवंटन पहले से तय होंगे, जिससे फंड खत्म होने पर काम रुक जाएगा। मनरेगा में महंगाई से जुड़ी अधिसूचित मजदूरी दी जाती थी।

नए कानून में इस निश्चितता को खत्म कर दिया गया है। इसके अलावा अब कृषि के पीक सीजन में 60 दिन काम नहीं मिल सकेगा। जब गांवों में सबसे ज्यादा परेशानी होगी, तो सरकार कानूनी तौर पर काम देने से मना कर सकती है। साथ ही, बायोमेट्रिक्स को पारदर्शिता के बजाय बहिष्करण का हथियार बनाया जा रहा है,जिससे गरीब और कम पढ़े-लिखे मजदूर रोजगार से वंचित हो जाएंगे। वीबी-ग्राम-जी कानून के तहत पंचायतें केंद्रीय ठेकेदारों के लिए केवल श्रम आपूर्ति कर्ता बनकर रह जा एंगी, ठेकेदारों की पीछे के दरवाज़े से वापसी होगी और भ्रष्टाचार बढ़ेगा।उन्होंने कहा कि केंद्र ने मजदूरी के लिए अपना हिस्सा 100 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया है, जिससे राज्यों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार का दावा काम के दिन बढ़ाकर करने का है, लेकिन केंद्र का बजट कम होने से असल में काम के दिन कम हो जाएंगे। वेणुगोपाल ने कानून से महात्मा गांधी का नाम हटाने की भी कड़ी निंदा की।

वेणुगोपाल ने अभियान की जानकारी देते हुए बताया कि पहले चरण में आगामी 8 जनवरी को प्रदेश कांग्रेस मुख्यालयों में तैयारी बैठकें होंगी। 10 जनवरी को जिला स्तर पर पत्रकार वार्ताएं आयोजित की जाएंगी। 11 जनवरी को जिला मुख्यालयों पर महात्मा गांधी या बाबा साहेब बीआर अंबेडकर की प्रतिमाओं के सामने मनरेगा श्रमिकों की भागीदारी के साथ एक-दिवसीय उपवास रखा जाएगा। दूसरे चरण में 12 से 29 जनवरी तक पंचायत स्तर पर चौपाल और बड़े पैमाने पर जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के पत्र प्रधानों, पूर्व ग्राम प्रधानों, रोजगार सेवकों और मनरेगा श्रमिकों तक पहुंचाए जाएंगे। इसके साथ ही विधानसभा स्तर पर नुक्कड़ सभाएं और पर्चे वितरण भी होंगे।
30 जनवरी (शहीदी दिवस) पर वार्ड और ब्लॉक स्तर पर शांतिपूर्ण धरना दिया जाएगा।
तीसरा चरण 31 जनवरी से 25 फरवरी तक चलेगा। इसके तहत 31 जनवरी से 6 फरवरी तक जिला स्तर पर जिला उपायुक्त या जिला मजिस्ट्रेट कार्यालयों पर धरने आयोजित किए जाएंगे। 7 से 15 फरवरी के बीच राज्य स्तर पर विधानसभाओं या राजभवनों का घेराव होगा। अभियान के समापन के रूप में 16 से 25 फरवरी तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा चार प्रमुख क्षेत्रीय रैलियों का आयोजन किया जाएगा।कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने कहा कि यह आंदोलन दिल्ली-केंद्रित नहीं होगा, बल्कि पंचायत, ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर लड़ा जाएगा। उन्होंने कहा कि नए कानून में रोजगार की कोई गारंटी नहीं है। राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता की कोई गारंटी नहीं है। धन का आवंटन, आधार और लाभार्थी पंचायतें- सब कुछ केंद्र सरकार तय करेगी। जयराम रमेश ने नए कानून में केंद्र की 60 प्रतिशत और राज्य की 40 प्रतिशत वित्तीय जिम्मेदारी तय करने को संविधान के अनुच्छेद 258 का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 258 के अनुसार यह राज्य सरकारों की सहमति से ही लागू किया जा सकता है, लेकिन केंद्र ने बिना किसी सहमति के मनमाने ढंग से यह थोप दिया है। इसकी वैधता को न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।जयराम रमेश ने याद दिलाया कि 2005 में मनरेगा सर्वसम्मति से पारित हुआ था। इसका मसौदा स्थाई समिति को भेजा गया था, जिसके तत्कालीन अध्यक्ष भाजपा नेता कल्याण सिंह थे। समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर ही कानून लागू किया गया था।उन्होंने व्यंग्य किया कि नए कानून में ‘वीबी’ का मतलब ‘विकसित भारत’ नहीं, ‘विनाश भारत’ है और ‘जी’ का मतलब ‘केंद्रीकरण की गारंटी’ है।
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