
अजीत सिन्हा की रिपोर्ट
नई दिल्ली:कांग्रेस ने आईडीबीआई बैंक को विदेशी कंपनी फेयरफैक्स के हाथों बेचने में मोदी सरकार पर घोटाले का आरोप लगाते हुए पूरी बिक्री प्रक्रिया तत्काल रोकने और मामले की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच कराने की मांग की है। पार्टी ने कहा है कि कनाडा की फेयरफैक्स कंपनी आईडीबीआई बैंक को खरीदने के लिए उसी बैंक के पैसे का इस्तेमाल कर रही है।

कांग्रेस कार्यालय में पत्रकार वार्ता करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि आईडीबीआई बैंक को खरीदने के लिए फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की ओर से बताया गया है कि शुरुआती भुगतान उसके द्वारा किया जाएगा और बाकी रकम आईडीबीआई बैंक के पास मौजूद पूंजी से ही जुटाई जाएगी। उन्होंने फेयरफैक्स के चेयरमैन प्रेम वत्स को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी बताया और कहा कि उन्हें फायदा पहुंचाने के लिए देश का एक महत्वपूर्ण बैंक बेचा जा रहा है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार और एलआईसी मिलकर आईडीबीआई बैंक में अपनी कुल 60.72 फीसदी हिस्सेदारी बेच रहे हैं। इस हिस्सेदारी को 52,878 करोड़ रुपये में फेयरफैक्स कंपनी को बेचकर सरकार बैंक का पूरा नियंत्रण उसे सौंप रही है और सार्वजनिक उपक्रम का दर्जा खत्म कर रही है।

गोहिल ने कहा कि आईडीबीआई बैंक घाटे में नहीं है, बल्कि लगातार मुनाफा कमाने वाली संस्था है। बैंक ने 2021 से 2026 तक कुल 30,105 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया है। प्रति कर्मचारी मुनाफे के मामले में भी आईडीबीआई प्रमुख बैंकों में आगे है। उन्होंने बताया कि बैंक के पास देश के प्रमुख शहरों में 29 कीमती संपत्तियां भी हैं, जो इस सौदे के तहत विदेशी कंपनी के हाथों में चली जाएंगी। कांग्रेस नेता ने बैंक के शेयरों के मूल्यांकन की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले वैल्यूएशन में एक शेयर की कीमत 94.42 रुपये तय की गई थी, लेकिन बोली खुलने के बाद पुराने मूल्यांकन को खारिज कर दोबारा वैल्यूएशन कराया गया और कीमत घटाकर 75 रुपये कर दी गई। उन्होंने पूछा कि जब टेंडर खुलने के बाद मूल्यांकन बदलना नियमों के सरासर खिलाफ है, तो आखिर किसके कहने पर ऐसा किया गया? उन्होंने कहा कि बैंक से जुड़े आयकर विवादों के निपटारे को लेकर खरीदार को दी गई रियायतों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही है और सरकार दूसरे बोलीदाता की पहचान भी उजागर नहीं कर रही है। कांग्रेस नेता ने जोर देकर कहा कि इस बैंक को बेचा ही नहीं जा सकता है। उन्होंने 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह के संसद में दिए गए वक्तव्य का हवाला देते हुए कहा कि उस समय सरकार ने स्पष्ट किया था कि आईडीबीआई में सरकारी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि अब भाजपा सरकार अपना वादा तोड़कर बैंक को बेचने पर तुली है। उन्होंने बताया कि संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने भी सिफारिश की थी कि आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी कभी भी 51 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिए।गोहिल ने कहा कि बैंक के निजीकरण से छोटे कारीगरों, लघु उद्योगों व एमएसएमई क्षेत्र को मिलने वाली वित्तीय सहायता और जनधन योजना जैसी सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि बैंक के विदेशी कंपनी के हाथ में जाने से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजनों और महिलाओं के लिए आरक्षित नौकरियां खत्म हो जाएंगी।कांग्रेस नेता ने आगे बताया कि इस निर्णय के विरोध में हड़ताल पर जा रहे बैंक कर्मचारियों को डराने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बहुत पहले ही बैंक कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात के बाद मांग की थी कि आईडीबीआई को किसी विदेशी कंपनी को न बेचा जाए। गोहिल ने केंद्र सरकार से बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल रोकने, पूरे मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित करने और दोनों मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने बोली खुलने के बाद दोबारा मूल्यांकन कराने के कारणों का खुलासा करने और आयकर विवादों के निपटारे में खरीदार को दी गई रियायतों की जानकारी सार्वजनिक करने की भी मांग की। उन्होंने दूसरे बोलीदाता का नाम सार्वजनिक करने को कहा और सवाल किया कि फेयरफैक्स की ओर से बैंक खरीदने के लिए जुटाई जा रही रकम के स्रोत और भुगतान की प्रक्रिया का कोई विवरण अब तक सामने क्यों नहीं रखा गया है।
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