अजीत सिन्हा की रिपोर्ट
नई दिल्ली:कांग्रेस ने मोदी सरकार से यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाने के फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग की है। पार्टी ने कहा है कि मोदी सरकार ने अमेरिका के दबाव में यह फैसला लेकर महंगाई से जूझ रहे देशवासियों पर अतिरिक्त बोझ डालने का काम किया है। कांग्रेस कार्यालय में पत्रकार वार्ता करते हुए पार्टी की सोशल मीडिया एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की चेयरपर्सन सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि नए प्रावधानों के तहत अब व्यक्ति से व्यापारी के बीच दो हजार रुपये से ऊपर के यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) के नाम पर वसूला जाएगा। पांच हजार रुपये की खरीदारी पर बीस रुपये और दस हजार रुपये की खरीदारी पर चालीस रुपये का शुल्क लगेगा। उन्होंने कहा कि यह फैसला देश के गरीबों, युवाओं, छात्रों, किसानों और मजदूरों पर बड़ा वार है, क्योंकि पहले यूपीआई भुगतान पूरी तरह मुफ्त था।

कांग्रेस नेता ने मोदी सरकार के इस दावे को खारिज कर दिया कि यह शुल्क केवल व्यापारियों पर लागू होगा। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यापारी अपनी जेब से यह शुल्क नहीं भरेगा और अंततः उत्पाद व सेवाओं की कीमतें बढ़ाकर इसका बोझ ग्राहकों पर ही डाला जाएगा। उन्होंने महंगाई से जूझ रहे लोगों पर इस अतिरिक्त बोझ को अस्वीकार्य बताया।श्रीनेत ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में यह फैसला लिया गया है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी भुगतान कंपनियां लंबे समय से भारत की जीरो-एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं। उन्होंने कहा कि यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव की 2026 रिपोर्ट में भारत के यूपीआई के मुफ्त होने की आलोचना की गई थी, क्योंकि इससे वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसे अमेरिकी भुगतान नेटवर्क को नुकसान हो रहा था। उन्होंने कहा कि इस फैसले की सबसे बड़े लाभार्थी अमेरिकी स्वामित्व वाली कंपनियां फोनपे और गूगल पे हैं, जिनका पहले से ही 86 प्रतिशत भारतीय यूपीआई बाजार पर कब्जा है। ऐसे में एमडीआर रेवेन्यू इन कंपनियों की कमाई और वैल्यूएशन बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार के इस फैसले का फायदा फोनपे के भारत आईपीओ को भी पहुंचेगा। उन्होंने बताया कि फोनपे के इस आईपीओ को मार्च 2026 में रोक दिया गया था क्योंकि फोनपे का वैल्यूएशन दस अरब डॉलर से नीचे गिर गया था। कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि मोदी सरकार और आरबीआई के पास व्यापारियों या उपभोक्ताओं पर शुल्क लगाए बिना यूपीआई इकोसिस्टम को फंड करने का पर्याप्त पैसा है। उनका कहना था कि आरबीआई द्वारा सरकार को दिए गए सरप्लस के महज 7.2 प्रतिशत हिस्से से पूरे यूपीआई संचालन का खर्च उठाया जा सकता है, फिर भी आम जनता पर आर्थिक बोझ डाला जा रहा है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि यूपीआई की नींव डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने रखी थी।श्रीनेत ने कहा कि सबसे बड़ी दिक्कत वाली बात यह है कि मोदी सरकार ने इस निर्णय से पहले संसद में झूठ बोला। उन्होंने बताया कि छह अगस्त को मोदी सरकार द्वारा लगाए गए कराधान एवं अन्य विधियाँ (संशोधन) विधेयक, 2026 ने वो गारंटी हटा दी थी, जो यूपीआई लेन-देन को मुफ्त रखती थी। इसी से एमडीआर लगाने का रास्ता खुल गया था। उन्होंने बताया कि उस समय वित्त मंत्री ने कहा था कि एमडीआर पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। 10 अगस्त को भी सदन में उन्होंने कहा था कि एमडीआर का कोई फ्रेमवर्क फाइनल नहीं हुआ है। इसके बावजूद 14 सितंबर को नोटिफिकेशन जारी कर शुल्क लगा दिया गया।कांग्रेस नेता ने सवाल किया कि महंगाई से जूझ रहे लोगों को राहत देने के बजाय मोदी सरकार उनके ऊपर बोझ क्यों बढ़ा रही है और अमेरिकी कंपनियों की जेब में पैसा क्यों भरा जा रहा है? अमेरिकी कंपनियों के दबाव में देश विरोधी फैसले क्यों लिए जा रहे हैं? क्या देश के लोगों की जेब पर डाका डालकर फोनपे के आईपीओ का वैल्यूएशन बढ़ाया जा रहा है? यूपीआई चलाने का खर्च मोदी सरकार और आरबीआई क्यों नहीं उठा सकते, जबकि यह आरबीआई द्वारा सरकार को दिए जाने वाले सरप्लस का मात्र 7.2 प्रतिशत है। उन्होंने सरकार से अमेरिका के आगे झुकना बंद करने और यूपीआई को पहले की तरह मुफ्त रखने की मांग की।
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