अजीत सिन्हा की रिपोर्ट
चंडीगढ़: सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह व्यापार समझौता भारतीय किसानों के हितों पर कुठाराघात है। मोदी सरकार ने ट्रम्प के आगे घुटने टेक कर कृषि क्षेत्र में अमरीकी निर्यात के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा जिस टैरिफ डील की घोषणा हुई, उसमें कृषि कहाँ से आया? हिंदुस्तान के मार्केट में अमेरिका के कृषि उत्पादों के लिए कोई जगह नहीं है। देश का किसान अपने खून-पसीने की मेहनत से देश का पेट भरता है। देश में पहले ही खाद्यान्न सरप्लस है, ऐसे में अगर बाहर से आयात होगा तो उसका नुकसान देश के किसान को होगा, देश की अर्थव्यवस्था को भी होगा। हम इसका पुरजोर विरोध करते हैं। उन्होंने मांग करी कि सरकार कृषि क्षेत्र में अमेरिकी प्रोडक्ट्स लाने के सौदे का सारा मसौदा देश के सामने पारदर्शिता से रखे। किसान हित में पहले भी हमने तीन कृषि कानूनों पर आंदोलन से लेकर संसद तक लड़ाई लड़ी, अब दोबारा से लड़ाई लड़ेंगे।

उन्होंने कहा कि केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा भारत–अमेरिका के बीच हुए इस व्यापार समझौते ने देश के किसानों,एमएसएमई, घरेलू उद्योग और आम उपभोक्ता के हितों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह समझौता राष्ट्रीय हित में नहीं, बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अमेरिकी कॉरपोरेट लॉबी के दबाव में किया गया आत्मसमर्पण प्रतीत होता है। यह समझौता ‘आत्मनिर्भर भारत’ के नारे का खुला मज़ाक है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि सरकार दवाइयों, डिजिटल डेटा और ई-कॉमर्स जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी अमेरिकी शर्तें मानने को तैयार दिख रही है। इससे सस्ती जेनेरिक दवाइयों पर खतरा, डेटा संप्रभुता का हनन और देशी स्टार्ट-अप्स का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि यह समझौता भारतीय किसानों के लिए घातक साबित होगा। अमेरिकी कृषि उत्पादों को छूट देकर सरकार देश के अन्नदाता को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने असहाय बना रही है। इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की अवधारणा कमजोर होगी और पहले से गहरे संकट में फंसे किसान और अधिक संकट में धकेले जाएंगे। अमेरिकी कृषि उत्पादों पर आयात छूट देकर केंद्र सरकार भारतीय किसानों की फसल के दाम जानबूझकर गिराने जा रही है। इस समझौते से MSP व्यवस्था कमजोर होगी और सरकारी खरीद व्यवस्था खत्म करने का दबाव बढ़ेगा। इस समझौते से डेयरी सेक्टर पर सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है। अमेरिकी औद्योगिक डेयरी कंपनियों के सामने भारत के छोटे दुग्ध किसान बाजार से बाहर हो जाएंगे। बीज और खेती पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्ज़ा बढ़ेगा। पेटेंट बीजों के कारण किसान हर साल महंगे बीज खरीदने को मजबूर होगा। आयात पर निर्भरता बढ़ने से देश की खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी।उन्होंने कहा कि सरकार निर्यात बढ़ने का दावा तो कर रही है, लेकिन अमेरिकी बाजार भारतीय कृषि उत्पादों के लिए आज भी बंद है। यह समझौता दोतरफा नहीं बल्कि एकतरफा आत्मसमर्पण है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देकर किसान को मालिक से मजदूर बनाने की साज़िश की जा रही है। बिना संसद में चर्चा और किसानों से राय लिए ऐसा समझौता करना लोकतंत्र का अपमान है। अमेरिका अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है, जबकि भारत में किसान पहले से कर्ज़, महंगाई और बढ़ती लागत की मार झेल रहा है। अमेरिका भारत पर अपने बाजार खोलने का दबाव बनाने में सफल हुआ। केंद्र की बीजेपी सरकार सिर झुकाकर इस दबाव को स्वीकार कर रही है।
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