
अजीत सिन्हा की रिपोर्ट
चंडीगढ़:इतिहास के सबसे करुण और प्रेरक अध्यायों में दर्ज साहिबजादों के अद्वितीय बलिदान को स्मरण करते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब पहुँचे। यह वही पावन धरती है जहाँ धर्म, सत्य और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबज़ादों—बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी ने अल्पायु में ही सर्वोच्च बलिदान दिया। वीर बाल दिवस छोटे साहिबजादों को स्मरण करने और भावी पीढ़ियों को उनके जीवन से प्रेरणा देने का महान दिवस है।मुख्यमंत्री ने उस ऐतिहासिक स्थल पर माथा टेका, जहाँ अत्याचार के सामने झुकने से इनकार करने पर साहिबजादों को दीवार में चुनवा दिया गया था। मुख्यमंत्री ने नतमस्तक होकर बाल्यावस्था में ही प्रदर्शित की गई उस नैतिक दृढ़ता और आस्था को नमन किया, जिसने सम्पूर्ण मानवता को साहस और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा दी। धर्म, आस्था व मानवता की सेवा का संदेश देते हुए मुख्यमंत्री स्वयं गुरुद्वारा परिसर में सेवा भी की।

गुरुद्वारा परिसर में उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच यह क्षण स्मरण कराता रहा कि वीरता केवल युद्ध भूमि में नहीं, बल्कि सत्य और विश्वास पर अडिग रहने में भी निहित होती है। साहिबजादों का बलिदान आज भी समाज को यह संदेश देता है कि उम्र नहीं, बल्कि संकल्प ही इतिहास रचता है। वीर बाल दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री की यह श्रद्धांजलि उस सामूहिक चेतना को पुनः जागृत करती है, जो नई पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक मूल्यों, नैतिक साहस और मानवीय गरिमा से जोड़ने का कार्य करती है।
गुरुद्वारा शहीद बाबा मोतीराम मेहरा में भी की अरदास
इसी कड़ी में मुख्यमंत्री ने गुरुद्वारा शहीद बाबा मोतीराम मेहरा में पहुंचे और वहां माथा टेका और अरदास की। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबज़ादों—बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी—को सरहिंद के नवाब द्वारा ठंडे बुर्ज में कैद रखा गया था। ऐसे समय में बाबा मोतीराम मेहरा ने मानवता की आवाज़ को अपने अंतःकरण में सर्वोपरि रखा। कठोर प्रतिबंधों और मृत्यु के भय के बावजूद, बाबा मोतीराम मेहरा ने साहिबजादों को दूध की सेवा की।मुख्यमंत्री ने बाबा मोतीराम मेहरा के बलिदान को नमन करते हुए कहा कि यह बलिदान केवल सिख इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक शाश्वत संदेश है—कि सत्य और करुणा की राह पर चलने वाला व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता। आज गुरुद्वारा शहीद बाबा मोतीराम मेहरा श्रद्धा और सम्मान का केंद्र है। यहाँ आने वाला हर श्रद्धालु उस निस्वार्थ सेवा को नमन करता है, जिसने यह सिखाया कि सच्चा धर्म दूसरों के दुख में सहभागी होना है। यह स्थल याद दिलाता है कि साहस तलवार से नहीं, बल्कि करुणा से जन्म लेता है।
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