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6000 करोड़ का कोयला घोटाला: लगभग 60 लाख टन कोयला, दूसरे राज्यों के उद्योगों को 4 गुना दामों में बेच दिया-कांग्रेस।

अजीत सिन्हा की रिपोर्ट
नई दिल्ली:कांग्रेस प्रवक्ता प्रो. गौरव वल्लभ ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि साथियों, आप सभी को सादर नमस्कार। 2008 से एक मॉडल चल रहा था, गुजरात में उस मॉडल का पर्दाफाश आज हुआ है। उस मॉडल का नाम है, ‘खूब खाऊँगा और खूब खाने दूँगा’। खूब खाओ और खूब खाने दो और उस मॉडल के तहत पिछले 14 साल में गुजरात की सरकार ने कोयला खा लिया है और कोयला किसका- जो छोटे उद्योगों को कोयला मिलना था।

जो यूपीए की सरकार ने एमएसएमई को बढ़ावा देने के लिए स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज को सस्ते दामों में कोयला मुहैया कराने के लिए एक योजना लागू की, 2007 में, जिसको 2008 में इंप्लिमेंट किया गया। उस योजना के तहत हर राज्य सरकार को ये कहा गया कि आप छोटे उद्योगों को, मझोले उद्योगों को, एसएमईस को सस्ते भाव में कोयला दोगे। गुजरात सरकार ने भी उस योजना में अपनी प्रतिभागिता दिखाई और कुछ एजेंसीज को अपॉइंट किया। उन एजेंसीज ने क्या किया- गुजरात के एसएमईस को कोयला नहीं दिया, दूसरे राज्यों के बड़े उद्योगों को जाकर वो कोयला तीन गुना कीमत में बेच दिया।लगभग 60 लाख टन कोयला, जो गुजरात के छोटे उद्योगों को मिलना चाहिए था, जिन पर उनका हक था, जो यूपीए की सरकार ने 2007 में एमएसएमईस को बढ़ावा देने के लिए एमएसएमईस को देने की बात कही, गुजरात की सरकार ने पिछले 14 साल में 60 लाख टन कोयला राज्य के बाहर, दूसरे उद्योगों को लगभग 4 गुना कीमत पर बेच दिया, तो खूब खाऊँगा और खूब खाने दूँगा। कौन-कौन इसके प्रतिभागी हैं, इस स्टोरी के कौन-कौन एक्टर्स हैं, उस पर आ रहा हूँ मैं। कोल स्कैम लगभग 6 हजार करोड़। ये जो 60 लाख टन कोयला, जो 3-4 गुना कीमत पर दूसरे राज्यों को बेचा गया, उसकी टोटल कीमत है, 6 हजार करोड़ और 6 हजार करोड़ का घोटाला तो है ही, पर जिनको मिलना चाहिए था, एमएसएमईस को, छोटे उद्योगों को, आज गुजरात में लाखों छोटे उद्योग बंद हुए हैं, क्योंकि उनका कोयला, या तो किसी और ने काम में ले लिया। गुजरात सरकार ने तो जो उनके भाग का कोयला था, 60 लाख टन, उसको कहीं और दूसरे राज्यों में बेच दिया। कैसे हुआ ये घोटाला 6 हजार करोड़ का अब इसमें प्वाइंट बाई प्वाइंट आता हूँ।14 साल पहले भारत में जो यूपीए की सरकार थी, उसने ये कहा कि छोटे उद्योगों को हैंड होल्डिंग की जरुरत है। तो इनको कोयला सही कीमत पर, रियायती कीमत पर, कम कीमत पर मुहैया कराया जाए, तो उन्होंने हर राज्य सरकार को बोला कि आप कोल इंडिया की माइंस से छोटे उद्योगों के लिए कोयला सीधा आपके पास आ जाएगा, आप चिंता मत करिएगा। आप उस कोयले को अपने राज्य के छोटे उद्योगों में, मझले उद्योगों में बांट देना और उसके दाम जो निर्धारित हुए, वो हुए लगभग 3 हजार रुपए प्रति टन के अनुसार; 1,800 से 3,000 रुपए प्रति टन के हिसाब से। गुजरात की सरकार ने क्या किया?गुजरात की सरकार ने कहा कि हम ये काम खुद नहीं करेंगे। सबसे पहले तो एक एजेंसी को अपॉइंट किया, जिसका नाम रखा ‘एसएनए’, स्टेट नोटिफाइड एजेंसी और वो एजेंसियों की कहानी भी बताऊँगा अभी। उन एसएनएज को सारा कोल इंडिया के जो माइंस से, और कौन सी माइंस थी, गुजरात सरकार से जो ऐलोकेट हुआ 2007 में- वेस्ट कोल फील्ड और साउथ ईस्ट कोल फील्ड से कोयला एक स्टेट नोटिफाइड एजेंसी को मिलना चालू हो गया। 4-5 स्टेट नोटिफाइड एजेंसीज हैं। उन स्टेट नोटिफाइड एजेंसीज का काम था कि गुजरात के जो राज्य में छोटे उद्योग हैं, उनको वो कोयला 1,800 से 3,000 रुपए प्रति टन में उपलब्ध कराएं। गुजरात सरकार की स्टेट नोटिफाइड एजेंसीज ने वो कोयला गुजरात के बाहर क्या दाम में बेचा- 8 से 10 हजार रुपए प्रति टन में। ये मैं नहीं, ये सारे कागज भी मैं आपको दिखाऊँगा कि ये कैसे घोटाला हुआ है, ये सारा। स्टेट नोटिफाइड एजेंसीज ने क्या-क्या घोटाले किए हैं, औऱ कौन-कौन सी वो एजेंसीज थीं, उनका पूरा मैं ब्लू प्रिंट लेकर आया हूँ।

साथियों, यहीं बात नहीं रुकी, गुजरात की सरकार का एक विभाग है, उद्योग विभाग, उसको एक परफोर्मा में लिखना पड़ता है कि किस एजेंसी को आपने कितना कोयला दिया। तो वहाँ पर गुजरात की सरकार ने एजेंसी का नाम लिखा, वो मैं पढ़कर सुनाता हूँ, आपको- एबीसीडी, पहली एजेंसी।दूसरी एजेंसी, एएसडीएफ, तीसरी एजेंसी, एएक्सएमई, ये एजेंसियों के नाम हैं। ये चाइनीज नाम नहीं हैं, ये गुजरात की सरकार ने गुजरात में जो एजेंसियां हैं, उनके नाम हैं। मोबाइल नंबर सबके एक ही हैं- 9999999999; दस बार 9, सब एजेंसियों के फोन नंबर भी एक ही है। अब हुआ क्या, इन एजेंसियों को उद्योग विभाग ने जो कोयला…, क्योंकि इनको उद्योग विभाग ने एजेंसियों को नियुक्त किया। पिछले 14 साल में एजेंसियां एक ही है, चेंज नहीं हुई है, कोई चेंज नहीं हुई है, आपको लग रहा होगा, चेंज हुई है, नहीं।दूसरे राज्यों में क्या हो रहा है- दूसरे राज्यों में वहाँ का उद्योग विभाग स्वयं ये काम कर रहा है, जो गुजरात सरकार ने एजेंसियों को दिया। दूसरे राज्य में एजेंसियां नहीं है, और तो और एक बहुत इंपोर्टेंट और महत्वपूर्ण जानकारी मैं लेकर आया हूँ, आपके सामने। गुजरात में इंडस्ट्री मिनिस्टर कौन-कौन रहे, उनके नाम सुन लीजिए। 2007 से लेकर 2012 तक, ये घोटाला 2008 से चालू हुआ है। 2007 से लेकर 2012 तक शहंशाहों के शहंशाह, श्री नरेन्द्र मोदी जी गुजरात सरकार के उद्योग मंत्री भी थे। यहीं बात खत्म नहीं हुई, उसके बाद विजय रुपाणी जी बने, 2016 से 2021 वो भी उद्योग मंत्री। यहीं बात खत्म नहीं हुई, उसके बाद भूपेंद्र भाई पटेल बने, वो भी उद्योग मंत्री। मुख्यमंत्री कोई भी हो, उद्योग मंत्री पिछले 14 साल में से साढ़े दस, ग्यारह साल मुख्यमंत्री रहे हैं और ये उद्योग मंत्रालय का घोटाला है पूरा, क्योंकि ये जो काम है, जो ये 60 लाख टन कोयला, जो वितरण करने का काम है, वो उद्योग मंत्रालय को मिला।ये संयोग है या प्रयोग है कि गुजरात सरकार में, जिस विभाग में पिछले 14 साल में घोटाला हुआ, 6 हजार करोड़ रुपए का कोयला खा गए, और किनका- छोटे उद्योंगों का, मझोले उद्योगों का। उस विभाग का जो प्रमुख था, कोई मंत्री नहीं था, मुख्यमंत्री स्वयं वहां के मंत्री थे। Is it a co-incidence or an experiment?

इस बाबत हमारे 4 महत्वपूर्ण सवाल हैं। ये सारे एविडेंसेज मैं आपको दूँगा।

1. A time bound investigation under the sitting judge of Supreme Court of India. एक समय जैसे, एक महीना, दो महीने की इंवेस्टिगेशन, क्योंकि 6 हजार करोड़ का कोयला खा गए और इन चारों मुख्यमंत्री, क्योंकि चारों मुख्यमंत्री जो थे, इन चार में से तीन के पास उद्योग मंत्रालय का कार्यभार था। इन चार में से तीन मुख्यमंत्री, जो उद्योग मंत्री भी थे और मुख्यमंत्री थे, इन चारों मुख्यमंत्री को… कौन हैं, वो चारों- श्री नरेन्द्र मोदी, श्रीमती आनंदीबेन पटेल, श्री विजय रुपाणी, श्री भूपेन्द्र भाई पटेल। इन चारों मुख्यमंत्री से इंवेस्टिगेशन किया जाए, क्योंकि इन चार में से तीन मुख्यमंत्री के पास उद्योग, माइनिंग और मिनरल विभाग भी था। मैंने पहला राज्य देखा है ऐसा जहाँ पर मुख्यमंत्री का इंट्रेस्ट इंडस्ट्री मिनिस्ट्री और माइनिंग में भी ज्यादा है, वो मेरे को अब समझ में आ रहा है और देश को भी समझ में आ रहा है। तो time bound investigation under the supervision of the sitting judge of the Supreme Court of India to investigate the involvement of all four CMs- Shri Narendra Modi Ji, Smt. Anandiben Patel Ji, Shri Vijay Rupani Ji, Shri Bhupendrabhai Patel Ji in this Rs 6,000 crore Ghotala. This is point number one.

2. In last 14 years, when this scam happened, पिछले 14 सालों में, जब ये स्कैम हुआ, उनमे से 10 से ज्यादा सालों के अंदर जो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, वो उद्योग मंत्री भी थे, ऐसा क्यों? ऐसा दूसरा औऱ कोई राज्य क्यों नहीं है देश में, जहाँ पर पिछले 10-11 साल से मुख्यमंत्री, उद्योगमंत्री है, माइनिंग मिनिस्टर है, मिनरल मिनिस्टर है, ऐसा क्यों? इसकी पूरी जांच होनी चाहिए, प्वाइंट नंबर- 2

3. स्टेट नोटिफाइड एजेंसी 14 साल से एक ही क्यों हैं? 3-4 हैं, उनको ही साल दर साल क्यों मिलता है, एसएनए का काम करने का दायित्व? दूसरी सरकारों ने स्वयं के विभागों को ये दायित्व दिया, गुजरात सरकार ये दायित्व इन 3-4 एजेंसियों को साल दर साल क्यों दे रही है? ऐसा गुजरात सरकार का इन एजेंसीज के साथ क्या रिश्ता है, इसकी पूरी जांच होनी चाहिए?

4. ये बहुत गंभीर आरोप है, क्योंकि अगर इन्होंने जैसा कि आ रहा है, कोयला कि 60 लाख टन दूसरे राज्यों में बेचा, इसका मतलब जीएसटी भी नहीं दी होगी, फर्जी बिल बनाए होंगे, इंकम टैक्स भी नहीं दिया होगा। ईडी, एसएफआईओ, इंकम टैक्स, फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट औऱ सारे एजेंसीज मूकदर्शक क्यों बने हुए हो? अब तक तो केस रजिस्टर होकर तहकीकात होना चालू हो जाना चाहिए था कि ये 6 हजार करोड़ का घोटाला किसने किया? क्योंकि कितने फर्जी बिल बने? क्या पता ये जो 6 हजार करोड़ का घोटाला आज दिख रहा है, आगे जाकर 6 लाख करोड़ का घोटाला मिले। तो ये सारी एजेंसीज को प्राईमाफेसी केस रजिस्टर करके इंवेस्टीगेशन चालू कर देनी चाहिए क्योंकि इन सब चीजों के लिए फेक बिल बनाए होंगे, अन्यथा दूसरे राज्य में आप बेच ही नहीं सकते। फेक बिल बनाए होंगे, तो जीएसटी आपने नहीं दिया होगा, इंकम टैक्स आपने नहीं दिया होगा, सेल्स टैक्स स्टेट को नहीं मिला होगा, ये सारे टैक्स की चोरी हुई होगी। तो ये सारी एजेंसीज अभी तक चुप क्यों हैं? हमारी मांग है कि इन सारी एजेंसीज को प्राईमाफेसी केस रजिस्टर करके इस केस की जांच करनी चाहिए।

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