
अरविन्द उत्तम की रिपोर्ट
दशहरे का पर्व पूरे देश में बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है और हर जगह रावण के पुतले फूंके जाते हैं। लेकिन दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव की तस्वीर बिल्कुल जुदा है। मान्यता है कि यह गांव रावण की जन्मस्थली है, इसलिए यहां कभी रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि दशहरे के दिन उसकी पूजा और विशेष हवन होता है। इस बार यहां के प्राचीन शिव मंदिर में रावण की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

ग्रेटर नोएडा के बिसरख में, जिसे रावण की जन्मस्थली और रावण का मंदिर भी कहा जाता है। हालांकि यह मूल रूप से प्राचीन शिव मंदिर है। पहले यहां रावण की मूर्ति नहीं थी, लेकिन इस वर्ष मंदिर परिसर में रावण की भव्य मूर्ति स्थापित कर दी गई है। इस गांव की सबसे बड़ी और अनोखी परंपरा यह है कि सदियों से आज तक यहां कभी रावण का पुतला नहीं जलाया गया। जहां पूरा देश दशहरे पर रावण दहन करता है, वहीं बिसरख में रावण की पूजा की जाती है।

मंदिर के महंत जी का कहना है कि यह तो सदियों पुरानी परंपरा है। जब से यह गांव बसा है, उससे पहले से ही यह परंपरा चली आ रही है। दशहरे के दिन रावण की मूर्ति के आगे विशेष हवन होगा, फूलों से सजावट की जाएगी और भव्य आरती व पूजा-पाठ का आयोजन होगा। यहां दोनों समय नित्य नियम से आरती होती है। बिसरख निवासी सचिन भाटी कहते है कि हमें गर्व है कि हमारे गांव में कभी रावण दहन नहीं होता। यह उनकी जन्मभूमि है और वे हमारे पूर्वज हैं। अपने गांव में कोई अपने पूर्वज का दहन कैसे देख सकता है?

हमारे यहां रावण बाबा का पूरा सम्मान है,गाड़ियों पर नाम से लेकर दुकानों तक उनका नाम आदर से लिया जाता है। भविष्य में भी यहां कभी रावण दहन नहीं होगा, केवल पूजा होगी।” मंदिर में दर्शन करने पहुंचे अन्य श्रद्धालुओं का कहना है कि हम यहां भगवान शिव के दर्शन के साथ-साथ इस ऐतिहासिक मान्यता के कारण आते हैं। सुना है कि रावण और उनके पिता ऋषि विश्रवा यहीं शिवजी की तपस्या करते थे। इसलिए मन में गहरी आस्था है। पूरे देश से अलग यहां की परंपरा को सभी श्रद्धा से निभाते हैं, तो बिसरख की यह परंपरा आज की नहीं बल्कि सदियों पुरानी है। जहां देश भर में दशहरे पर रावण का पुतला जलाकर बुराई के अंत का संदेश दिया जाएगा, वहीं बिसरख में अपने पूर्वज और परम शिवभक्त मानकर रावण की विधिवत पूजा-अर्चना और हवन किया जाएगा।
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