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चुनाव आयोग द्वारा विभिन्न राज्यों में कराई जा रही एसआईआर प्रक्रिया पर कांग्रेस ने उठाए गंभीर सवाल, पारदर्शिता की मांग की


अजीत सिन्हा की रिपोर्ट 
नई दिल्ली:कांग्रेस ने चुनाव आयोग द्वारा विभिन्न राज्यों में कराए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर गंभीर सवाल उठाते हुए प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की है। कांग्रेस का आरोप है कि बिना स्पष्ट लिखित दिशा-निर्देश, पर्याप्त प्रशिक्षण और ठोस कारण बताए एसआईआर को जल्दबाजी में लागू किया जा रहा है, जिससे आम मतदाताओं, खासकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले वर्गों को नुकसान हो रहा है। इंदिरा भवन स्थित कांग्रेस मुख्यालय में पत्रकार वार्ता करते हुए कांग्रेस सांसद शशिकांत सेंथिल ने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग पर इतनी जल्दबाजी में प्रक्रिया पूरी करने के लिए आखिर किसका दबाव है। उन्होंने कहा कि आयोग को एसआईआर की प्रक्रिया, डिडुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर, नए ऐप और इसके लागू होने व रोके जाने की समय-सीमा को लेकर एक स्पष्ट विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।
सेंथिल ने कहा कि एसआईआर के तहत घर-घर जाकर सत्यापन किया जाता है और मतदाता सूची को लगभग नए सिरे से तैयार करना होता है। उन्होंने बताया कि वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए उस क्षेत्र का निवासी होना जरूरी है, लेकिन इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। रोजगार के कारण लोगों के स्थान परिवर्तन की स्थिति में बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) को धरातल पर जाकर सूझबूझ से निर्णय लेना होता है। यह लंबी और जटिल प्रक्रिया पहले दो साल में पूरी होती थी, लेकिन अब इसे मात्र एक महीने में पूरा करने का दबाव बनाया जा रहा है, जिसके कारण कई बीएलओ पर अत्यधिक दबाव पड़ा है। सेंथिल ने कहा कि मौजूदा एसआईआर प्रक्रिया में मतदाताओं से एन्यूमरेशन फॉर्म भरवाए जा रहे हैं, जिनके अलग-अलग नियम हैं। एक वोटर का फॉर्म आने के बाद बीएलओ द्वारा जानकारी अपडेट की जाती है और दोबारा जांच के निर्देश दिए जाते हैं, लेकिन इसके आगे की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि आयोग रोज नए निर्देश ऐप के जरिये जारी कर रहा है, जिससे बीएलओ असमंजस में हैं। केवल एन्यूमरेशन फॉर्म के आधार पर निर्णय लेने से गंभीर समस्याएं पैदा होंगी। पारिवारिक रिकॉर्ड और 2002 की मतदाता सूची से मिलान जैसे नियमों का सबसे अधिक असर गरीब, प्रवासी और हाशिए पर रहने वाले लोगों पर पड़ेगा, जिनके पास आवश्यक दस्तावेज या डिजिटल मैपिंग नहीं है।

सेंथिल ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया ने देशभर में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी हो चुकी है और इनमें 10 से 15 प्रतिशत तक वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने की आशंका है। उन्होंने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कुछ वर्गों के मतदाताओं के नाम चुनिंदा रूप से हटाए जाने का भी उल्लेख किया।सेंथिल ने बिहार में एसआईआर के दौरान हुई गड़बड़ियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव तक डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के जरिए डुप्लीकेट नामों की पहचान की जाती थी, लेकिन बिहार में इसे खामी का हवाला देकर बंद कर दिया गया, जबकि अब 12 राज्यों में इसे फिर लागू किया गया है। उन्होंने इसे चुनाव आयोग का स्पष्ट यू-टर्न बताते हुए कहा कि बिहार की मतदाता सूची में अब भी करीब 14.5 लाख डुप्लीकेट नाम मौजूद हैं।सेंथिल ने मांग की कि चुनाव आयोग यह स्पष्ट करे कि डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का उपयोग कब शुरू किया गया और कब बंद किया गया तथा मतदाता सूची की विसंगतियों को दूर करने के लिए किस नए ऐप का इस्तेमाल किया जा रहा है, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए।

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