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कांग्रेस ने “रियल स्टेट ऑफ द इकोनॉमी 2026” रिपोर्ट जारी कर खोली मोदी सरकार के मजबूत अर्थव्यवस्था के दावों की पोल


अजीत सिन्हा की रिपोर्ट 
नई दिल्ली:कांग्रेस ने “रियल स्टेट ऑफ़ द इकोनॉमी 2026” रिपोर्ट जारी कर आंकड़ों के साथ मोदी सरकार के मजबूत भारतीय अर्थव्यवस्था के दावों की पोल खोली है। इस वार्षिक रिपोर्ट में उपलब्ध आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि भारत में आर्थिक असमानता व बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है और मोदी सरकार कल्याणकारी योजनाओं में कटौती कर रही है।कांग्रेस कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में रिपोर्ट जारी करते हुए कांग्रेस रिसर्च डिपार्टमेंट के चेयरमैन प्रो. राजीव गौड़ा और संचार विभाग में रिसर्च व निगरानी प्रभारी अमिताभ दुबे ने मोदी सरकार की प्राथमिकताओं को उजागर करते हुए कहा कि वर्तमान समय में कॉरपोरेट मुनाफ़ा बढ़ रहा है, जबकि सार्थक रोजगार सृजन नहीं हो पा रहा है।

उन्होंने बताया कि 2023–24 में कॉरपोरेट मुनाफा 22.3 प्रतिशत बढ़ा, जबकि रोजगार में केवल 1.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी व्यापक सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी गरीबों, युवाओं, किसानों और महिलाओं की चिंता करने का दावा करते हैं, लेकिन इन वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा जाल को लगातार कमजोर किया जा रहा है।राजीव गौड़ा ने रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत के सांख्यिकीय आंकड़ों को ‘सी’ ग्रेड दिया है। सरकार 0.5 प्रतिशत महंगाई दर का दावा कर रही है, लेकिन क्या आम जनता के लिए जीवनयापन की लागत इतनी मामूली बढ़ रही है?कांग्रेस नेता ने पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का हवाला देते हुए कहा कि वास्तविक जीडीपी ग्रोथ सरकारी आंकड़ों से कम से कम 2.5 प्रतिशत नीचे है। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में उत्पादन पद्धति से मापने पर विकास दर 9.2 प्रतिशत दिखाई गई, जबकि व्यय पद्धति से मापने पर यह केवल 4.9 प्रतिशत थी। ये दोनों आंकड़े आपस में मेल खाने चाहिए। लेकिन दोनों में जब इतना गंभीर अंतर हो, तो साफ है कि कुछ गड़बड़ है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार की हिस्सेदारी 12.1 प्रतिशत से घटकर 11.4 प्रतिशत रह गई है, सेवा क्षेत्र में 31.1 प्रतिशत से घटकर 29.7 प्रतिशत रह गई है। सितंबर 2025 तक युवा बेरोजगारी दर 15 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 18.4 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर है। शहरों में काम करना चाहने वाली एक-चौथाई युवा महिलाओं को नौकरी नहीं मिल पा रही है। प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना पर कटाक्ष करते हुए राजीव गौड़ा ने कहा कि नवंबर 2025 के अंत तक केवल 2,066 इंटर्नशिप पूरी हुईं और मात्र 95 युवाओं को नौकरी के प्रस्ताव मिले।रिपोर्ट में बढ़ती अमीर-गरीब की खाई पर भी चिंता जताते हुए बताया गया कि शीर्ष 10 प्रतिशत लोग राष्ट्रीय आय का 58 प्रतिशत कमाते हैं, जबकि नीचे के 50 प्रतिशत लोगों को सिर्फ 15 प्रतिशत मिलता है। देश की 40 प्रतिशत संपत्ति पर केवल ऊपर के एक प्रतिशत लोगों का कब्जा है,जबकि निचली 50 प्रतिशत आबादी के पास मात्र 6.4 प्रतिशत संपत्ति है। पांच में से चार भारतीय 200 रुपये प्रति दिन में गुजारा करते हैं, जबकि एक तिहाई देशवासी 100 रुपये प्रति दिन में गुजारा करते हैं। घरेलू वित्तीय बचत 5.2 प्रतिशत के साथ पांच दशकों के निचले स्तर पर पहुंच गई है। इसके अलावा रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है और नेट एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) नकारात्मक हो गया है, यानी देश में आने वाली पूंजी से ज़्यादा पूंजी भारत से बाहर चली गई। हर साल लगभग 5,000 करोड़पति देश छोड़कर जा रहे हैं। साथ ही खाद्य सब्सिडी कम हो रही है और भारत की 12 प्रतिशत आबादी कुपोषित है।मनरेगा योजना को लेकर रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते वर्षों में इसे व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया है। दो प्रतिशत से भी कम परिवारों को सुनिश्चित 100 दिन का काम मिला, जबकि वित्त वर्ष 2025–26 में औसतन रोजगार घटकर 37 दिन रह गया। अब सरकार नए कानून के जरिए गरीबों के सबसे बड़े सहारे मनरेगा को खत्म करने की साजिश कर रही है। केंद्र का हिस्सा 90 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया गया है। अब यह योजना मांग के बजाय बजट पर आधारित होगी और अफसरों की मर्जी से चलेगी।रिपोर्ट में सरकार द्वारा बुज़ुर्गों, महिलाओं और दिव्यांगजनों जैसे सबसे कमजोर तबकों को नजरअंदाज करने का भी जिक्र किया गया है, जो राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम यानी एनएसएपी के लिए घटते आवंटन से स्पष्ट हो जाता है। बताया गया है कि इसका बजट वित्तीय वर्ष 2014–15 में 10,547 करोड़ रुपये से घटकर वित्तीय वर्ष 2025–26 में 9,652 करोड़ रुपये रह गया है।दिल्ली के खतरनाक प्रदूषण स्तर का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदूषण केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि आर्थिक संकट भी है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दो सालों में स्कूल नामांकन 25.18 करोड़ से घटकर 24.69 करोड़ रह गया है। 3.5 लाख से ज़्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं। दस सालों में छात्रों की आत्महत्या के मामलों में 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
प्रो. राजीव गौड़ा और अमिताभ दुबे ने कहा कि केवल कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने वाली विकास दर सफलता नहीं होती, बल्कि एक चेतावनी होती है। बढ़ती असमानता और सिमटते कल्याण तंत्र को व्यापक आर्थिक कुप्रबंधन के स्पष्ट संकेत बताते हुए उन्होंने कहा कि देश को ऐसे समावेशी विकास मॉडल की जरूरत है जो रोजगार पैदा करे। उन्होंने आगे कहा कि मूल रूप से एक अच्छी नीति की शुरुआत ईमानदार आंकड़ों से होती है और सरकार से मांग की कि वह देश के सामने वास्तविक आंकड़े रखे, न कि जनता को गुमराह करने वाले तोड़-मरोड़ कर पेश किए गए आंकड़े।

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