
अजीत सिन्हा की रिपोर्ट
चंडीगढ़:हरियाणा कांग्रेस ने आज मनरेगा में बीजेपी सरकार द्वारा किए गए बदलावों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। इसमें पार्टी प्रभारी बीके हरिप्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा, प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष उदयभान, सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा, जयप्रकाश जेपी, वरुण मुलाना, सतपालब्रह्मचारी,जितेंद्र बघेल समेत तमाम वरिष्ठ नेता, सांसद, विधायक और हजारों कार्यकर्ता शामिल हुए।
तमाम लोगों ने कांग्रेस कार्यालय से विधानसभा की ओर मार्च किया। लेकिन पुलिस ने अलोकतांत्रिक रवैया अपनाते हुए शांतिपूर्ण मार्च को रास्ते में ही रोक लिया। सरकार की तानाशाही और मनरेगा को खत्म करने की साजिश के खिलाफ सभी ने जमकर नारेबाजी की। सभी ने हाथों में तख्तियां और पार्टी के झंडे लहराए व अपना जोरदार विरोध दर्ज करवाया।
पुलिस ने तमाम वरिष्ठ नेताओं और हजारों कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया।

इस मौके पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि बीजेपी सरकार ने दलित, पिछड़े, गरीबों, ग्रामीणों और पंचायतों के अधिकारों पर कुठाराघात किया है। लेकिन मनरेगा मजदूरों के साथ कांग्रेस मजबूती से खड़ी है और पूरे देश में उनके रोजगार की रक्षा के लिए अभियान चला रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सत्ता में आते मनरेगा को कमजोर करने में जुट गई थी। कांग्रेस द्वारा संसद में पूछे गए सवाल के जवाब से पता चला कि हरियाणा में 8 लाख से अधिक मनरेगा मज़दूर पंजीकृत थे। लेकिन 2024-25 में सरकार ने सिर्फ 2100 परिवारों को ही 100 दिन का काम दिया। सरकार ने मजदूरों को ना को काम दिया और ना ही स्कीम में प्रावधान के तहत मुआवजा दिया।

यानी इस योजना को हरियाणा में बीजेपी पहले ही लगभग खत्म कर चुकी थी। अब नाम बदलने के साथ-साथ इस योजना के अस्तित्व को ही मिटा दिया गया है। लेकिन कांग्रेस हर स्तर पर इसका विरोध करेगी और सरकार को यह जनविरोधी फैसला वापिस लेने के लिए मजबूर करेगी। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि कांग्रेस सरकार द्वारा लाई गई मनरेगा योजना महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज अभियान को आगे बढ़ाने वाली थी। इसमें मांग के आधार पर बजट का निर्धारण होता था। यानी इस कानून में बजट की कोई सीमा नहीं थी। तमाम राज्यों और जिलों, जितने लोग काम मांगते थे,उन्हें काम देना होता था। यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी थी कि उन तमाम मजदूरों के लिए बजट जारी करे। लेकिन अब उस बजट को भी केंद्र व राज्यों के बीच में इस तरह बांटा है कि उसका निर्धारण व संचालन ही मुश्किल हो जाए।
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