अजीत सिन्हा की रिपोर्ट
फरीदाबाद:जहाँ एक तरफ सर्दी का मौसम शुरू हो रहा है, वही वायु प्रदूषण भी धीरे-धीरे गंभीर स्तर पर पहुँच रहा है। अक्सर दिवाली के त्यौहार के बाद वायु प्रदूषण बहुत ज्यादा गंभीर स्थिति में पहुंच जाता है। सर्दी और वायु प्रदूषण के कारण ब्रेन स्ट्रोक का खतरा दोगुना हो सकता है। इस संबंध में जानकारी देते हुए मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स से न्यूरोलॉजी विभाग के क्लीनिकल डायरेक्टर डॉ. कुणाल बहरानी ने बताया कि सर्दी बढ़ने पर अक्सर ब्रेन स्ट्रोक एवं ब्रेन हेमरेज (दिमाग की नस फटने) के मामले ज्यादा बढ़ जाते हैं। बुजुर्ग लोगों, मोटापा से ग्रस्त लोगों, शुगर और उच्च रक्तचाप के मरीजों को स्ट्रोक होने का ज्यादा खतरा होता है। अस्पताल के आपातकालीन विभाग में सप्ताह में 9-10 मरीज ब्रेन स्ट्रोक के एडमिट होते हैं जिनमें 80 फीसदी मरीज मस्तिष्क की धमनियों में खून के थक्के और 20 प्रतिशत मरीज ब्रेन हेमरेज (मस्तिष्क की धमनियों का फट जाना) से पीड़ित पाए जाते हैं। दरअसल मस्तिष्क में रक्त का संचार रुक जाने के कारण स्ट्रोक हो जाता है। इसके लिए दो कारण जिम्मेवार हैं- मस्तिष्क की धमनियों में क्लॉट (खून के थक्के) का जमना और धमनियों का फट जाना। व्यक्ति का एक तरफ का चेहरा टेढ़ा हो जाना, शरीर के एक तरफ के हिस्से में लकवा हो जाना, व्यक्ति को इस बीमारी के शुरूआती लक्षण जैसे कि एकाएक बोलने में दिक्कत आना, चलने में परेशानी होना और बहुत अधिक चक्कर आना आदि लक्षण दिखाई देने पर उसे तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए क्योंकि स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है। अनियमित जीवन शैली, खराब खानपान और तनाव के कारण यह समस्या कम उम्र में भी हो सकती है लेकिन आमतौर पर 50 वर्ष की उम्र के बाद देखी जाती है। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल अधिक होने की शिकायत होती है और धूम्रपान एवं शराब का अधिक सेवन करते हैं, उनमें स्ट्रोक की सम्भावना सबसे अधिक होती है। वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से भी ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है क्योंकि प्रदूषित हवा में कई ऐसे केमिकल होते हैं तो ब्रेन में न्यूरो इंफ्लेमेशन (सूजन) के खतरे को बढ़ा सकते हैं। वहीं हवा में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर नसों और धमनियों में फैट को जमा करता है जिससे खून के फ्लो में बाधा पहुंचती है जिससे ब्रेन स्ट्रोक का जोखिम बढ़ सकता है।इसका पता करने के लिए सीटी स्कैन, एमआरआई एवं दिमाग की नसों की एंजियोग्राफी आदि जांचें की जाती हैं। स्ट्रोक होने के साढ़े चार घंटे अंदर मरीज को क्लॉट घुल जाने के लिए इंजेक्शन दिया जाता है जिससे मस्तिष्क की धमनियों में रक्त संचार फिर से शुरू हो जाता है। अगर ब्रेन हेमरिज छोटा है तो दवाइयां दी जाती है और ब्लड प्रेशर नियंत्रित किया जाता है। ब्रेन हेमरिज बड़ा होने पर ऑपरेशन किया जाता है। ब्रेन स्ट्रोक होने पर मरीज की जान बचाने के लिए पहला घंटा बहुत अहम् होता है इसलिए इसे “गोल्डन टाइम” माना जाता है। इस एक घंटे के अंदर उच्च प्रशिक्षित एवं अनुभवी न्यूरोसर्जन की देखरेख में इलाज किये जाने पर मरीज को गंभीर स्थिति में जाने से बचाया जा सकता है। देर करने से मरीज की जान को जोखिम बढ़ सकता है।
बचाव:
· धूम्रपान व शराब के सेवन से बचें।
· संतुलित आहार लें।
· नियमित व्यायाम करते रहें व अनावश्यक तनाव से दूर रहें।
· मोटापा न बढ़ने दें।
· सर्दी के मौसम में बुजुर्ग लोग, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप रोगी सुबह-शाम सर्दी से बचाव करें और ब्लड प्रेशर, शुगर लेवल चेक करते रहें।
· दोपहिया सवार, कामकाजी लोगों को अधिक सतर्क रहें-घर से बाहर निकलने के दौरान सिर को ढक कर रखें, ठीक तरीके से गर्म कपड़े पहनें
· सुबह नहाने के समय ठंडे पानी को पहले शरीर पर डालना चाहिए, उसके बाद सिर पर डालें
· वायु प्रदूषण से बचने के लिए घर के अंदर ही रहें, व्यायाम भी घर के अंदर ही करें
· अगर किसी जरूरी से काम से बाहर जा रहे हैं तो फेस मास्क का उपयोग करें
· खासकर सुबह और शाम के समय सैर न करें क्योंकि इस वक्त वायु प्रदूषण का स्तर ज्यादा होता है
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